Friday, April 17, 2026
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यमुना उफान पर लेकिन फिर भी ताजमहल को नहीं होता कोई नुकसान ,जानिए इसके पीछे का रहस्यमय राज़…

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नई दिल्ली। लगातार हो रही बारिश के कारण इस समय देश की कई नदियां उफान पर हैं। यमुना में तो जलस्‍तर खतरे के निशान से ऊपर निकलकर राजधानी दिल्‍ली के रिहायशी इलाकों में घुस गया था। लेकिन, यमुना कितना भी विकराल रूप ले ले, फिर भी कभी ताजमहल को नुकसान नहीं पहुंचा पाती है। समझते हैं कि आखिर ऐसा कैसे होता है।

यमुना नदी का जलस्‍तर बीते सप्‍ताह खतरे के निशान को पार कर गया था। यमुना अपने तटों को लांघकर राजधानी दिल्‍ली के रिहायशी इलाकों तक पहुंच गई थी। कुछ ऐसा ही हाल आगरा में भी हुआ, जब यमुना का पानी ताजमहल की दीवार तक पहुंच गया था। पहले भी कइ्र बार ऐसा हुआ है कि यमुना का पानी ताजमहल की दीवार तक पहुंचा है। लेकिन, कभी ऐसा नहीं हुआ कि उफनती हुई यमुना नदी ने इस शाहकार को कोई नुकसान पहुंचाया हो।

यमुना का जलस्‍तर कितना भी बढ़ जाए, ये ताज को जरा भी नुकसान नहीं पहुंचा सकती है। इसका श्रेय शाहजहां की इंजीनियरिंग की समझ को दिया जाता है। शाहजहां के दरबारी इतिहासकार ने इस बारे में काफी कुछ लिखा है। आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने भी ताजमहल को बनाने में बेहतरीन इंजीनियरिंग कॉन्‍सेप्‍ट के इस्‍तेमाल की पुष्टि की है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुताबिक 1978 और 2010 में भी ऐसी ही बाढ़ आई थी, लेकिन ताज टस से मस ना हुआ।

दस्‍तावेजों के मुताबिक, जब शाहजहां ने ताजमहल को बनाने के लिए इस जगह को चुना, उस वक्‍त भी यमुना के पानी का बहाव बहुत ज्यादा था। उस वक्‍त यमुना ताज के बेहतद नजदीक बहती थी। शाहजहां के दरबारी इतिहासकार अब्दुल हामिद लाहौरी ने पादशाहनामा में लिखा है कि ताजमहल की नींव को डिजाइन करते समय ध्‍यान रखा गया कि यमुना का पानी इसे नुकसान न पहुंचा पाए। ताजमहल को नदी के तीखे घुमाव के किनारे पर बनाया गया।

लाहौरी लिखते हैं कि शाहजहां ने ताजमहल के लिए इसी जगह को काफी कुछ ध्‍यान में रखकर चुना था ताकि बाढ़, तूफान और कटाव से प्रेम के इस प्रतीक को कोई नुकसान ना पहुंच पाए। हालांकि, ताजमहल बनने के तुरंत बाद इसमें दरार आ गई थीं। इसके बाद औरंगजेब ने इसकी नींव का काम दोबारा करवाया था। पहले इसमें लकड़ी की नींव बनाई गई। फिर चिनाई कराई गई। ताजमहल की नींव की पानी को लेकर संवेदनशीलता की वैज्ञानिक आधार पर भी पुष्टि की जा चुकी है।

ताजमहज का 1990 के दशक में सर्वेक्षण करने वाले आईआईटी रुड़की के पूर्व निदेशक एससी हांडा ने कहा था कि नींव में आबनूस के साथ महोगनी की लकड़ी का इस्तेमाल भी किया गया है। यह दोनों भीगने पर सड़ती नहीं हैं। इसलिए कभी खराब भी नहीं होती हैं।

ताज की नींव की बाहरी दीवार भी लकड़ी से बनाई गई है। इसीलिए यमुना का पानी बार-बार बाहरी दीवार तक पहुंचने के बाद भी ताजमहल का कुछ नहीं बिगाड़ पाता है। इसके अलावा ताज के पास यमुना मोड़ तीखा होने से बहाव धीमा हो जाता है।

शाहजहां ने ताजमहल को यमुना के पानी से बचाने के लिए किनारे के पास 42 कुएं भी बनवाए थे। ताज का मुख्य मकबरा ऊंचे चबूतरे पर बना है। इसकी नींव की संरचना ऐसी है कि बाढ़ का पानी इसे नुकसान नहीं पहुंचा सकता। साल 1978 और 2010 में ताजमहल इस साल की बाढ़ से ज्यादा बाढ़ का सामना कर चुका है।

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