Sunday, April 19, 2026
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जो मरहलों में साथ थे, वह मंज़िलों पे छुट गए- जो रात में लुटे ना थे, वह दोपहर में लुट गए

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जो मरहलों में साथ थे, वह मंज़िलों पे छुट गए
जो रात में लुटे ना थे, वह दोपहर में लुट गए
मगन था मैं कि प्यार के, बहुत से गीत गाऊँगा
जुबाँ गुंग हो गई, गले में गीत घुट गए
कटी हुई हैं उँगलियाँ, रुबाब ढूँढता हूँ मैं
जिन्हें सहर निगल गई वह ख्वाब ढूँढता हूँ मैं
कहाँ गई वह नींद की शराब ढूँढता हूँ मैं

08750858517

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