Sunday, April 12, 2026
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छाये मेघ निराशा काले,मरु पाप पांव है छाले। ले लो आकर सुधि भक्तों की,अब तो जागो रखवाले।।

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अब तो जागो रखवाले

छाये मेघ निराशा काले,मरु पाप पांव है छाले।
ले लो आकर सुधि भक्तों की,अब तो जागो रखवाले।।

हाहाकार मचा है भारी,पाप करे तांडव तीखा।
हाथ पसारे तुम्हें पुकारे,जन-जन का अंतस चीखा।।
कृपा करो हे जगत रचयिता,दूर करो तम के जाले।
ले लो आकर सुधि भक्तों की,अब तो जागो रखवाले।।

काम क्रोध लालच मद लोभित,मानव मन विष का प्याला।
भूल रहा मानवता मानव,सद्गुण पर पर्दा डाला।।
गौर वर्ण चमड़ी पर मरते,मन के हैं बिल्कुल काले।
ले लो आकर सुधि भक्तों की,अब तो जागो रखवाले।।

धर्म आड़ पाखंड रचाया,आडंबर कितने करता।
विधि विधान के नाम डराता,स्वयं तिजोरी ही भरता।।
जन जागरण करो प्रभु खोलो,मन संशय के सब ताले।
ले लो आकर सुधि भक्तों की,अब तो जागो रखवाले।।

मौलिक सृजन 
ऋतु अग्रवाल
मेरठ
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