Tuesday, April 14, 2026
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नारी अत्याचार से,हो त्रस्त व्याभिचार से- हुंकारे है दुर्गा,तथ्य कभी मत भूल।

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रुदन धरा कातर करे,धीर कहाँ तक मन धरे,
मानव दुर्जन होता,करता जाता भूल।
खींच भूमि आँचल लिया,छिन्न भिन्न अंतस किया,
लूट संपदा खुश है,हिली अवनि की चूल।।
नदियों को बंधक बना,काटे जंगल क्यों घना,
भला बुरा न सोचता,लोभ हुआ मशगूल।
त्राहि-त्राहि करती धरा,हो जाएगी बंजरा,
क्रोधित होकर लेगी,अम्बे तान त्रिशूल।।

नारी अत्याचार से,हो त्रस्त व्याभिचार से,
हुंकारे है दुर्गा,तथ्य कभी मत भूल।
महिषासुर मर्दन करे,चण्ड मुण्ड श्वासें हरे,
रूप धरे काली का,अम्बे तान त्रिशूल।।
हर युग हर ही काल में,पहुँचाए यम जाल में,
नर पिशाच दुष्टों को,देती दंड सटीक।
स्नेह प्रेम की धार है,ममता का उपहार है,
पर रक्षण संतानों,हो जाती निर्भीक।।

मौलिक सृजन 
ऋतु अग्रवाल
मेरठ
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