कर्म खोटे कर तुझे अज़मत नहीं
जीस्त में मिलती कभी बरकत नहीं//
हो कभी इसके कभी उसके गए
हैं हमें ऐसी अज़ी आदत नहीं//
अश्क ही आँखों से बहते हैं सदा
प्यार में मिलती कभी लज़्जत नहीं//
जान रखते हैं हथेली पर सदा
दुश्मनों से है हमें दहशत नहीं//
काम निकला तो भुला रिश्ते दिए
ऐसे लोगों के लिए फुर्सत नहीं//
दूसरों के मशविरों पर ज़िंदा हो
क्या तुम्हारा अपना कोई मत नहीं//
क्यों नशे के वास्ते बेचैन हो
ये तुम्हें अच्छी लगी है लत नहीं//
मौलिक सृजन
ऋतु अग्रवाल
मेरठ



