Sunday, April 19, 2026
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वफ़ा में जफ़ा ‘ऋतु’ अज़ी दे गया यूँ हमें फिर कभी मुस्कुराना न आया

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ग़ज़ल

हमें प्यार अपना जताना न आया
लगा जख़्म दिल पर दिखाना न आया//

तुम्हारी गली की बहुत आरज़ू थी
गुज़रने का उससे बहाना न आया//

हमें देख उसने झुका ली थीं पलकें
मुहब्बत को दिल में छुपाना न आया//

बड़ी बेमुरव्वत अज़ी जीस्त है फिर 
किसी को तुम्हें गर हँसाना न आया//

दिये दोष हमको भले झूठ सच हों
हमें बात कड़वी सुनाना न आया//

बहे अश्क़ मेरे बहुत खुश हुए वो
किसी को हमें पर रुलाना न आया//

वफ़ा में जफ़ा 'ऋतु' अज़ी दे गया यूँ
हमें फिर कभी मुस्कुराना न आया//

मौलिक सृजन 
ऋतु अग्रवाल 
मेरठ
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