ग़ज़ल हमें प्यार अपना जताना न आया लगा जख़्म दिल पर दिखाना न आया// तुम्हारी गली की बहुत आरज़ू थी गुज़रने का उससे बहाना न आया// हमें देख उसने झुका ली थीं पलकें मुहब्बत को दिल में छुपाना न आया// बड़ी बेमुरव्वत अज़ी जीस्त है फिर किसी को तुम्हें गर हँसाना न आया// दिये दोष हमको भले झूठ सच हों हमें बात कड़वी सुनाना न आया// बहे अश्क़ मेरे बहुत खुश हुए वो किसी को हमें पर रुलाना न आया// वफ़ा में जफ़ा 'ऋतु' अज़ी दे गया यूँ हमें फिर कभी मुस्कुराना न आया// मौलिक सृजन ऋतु अग्रवाल मेरठ



