क्यों भटकती है तू दर-ब-दर ज़िन्दगी तू भी मुझ सी हुई बेअसर ज़िन्दगी// मौत को तो गले से लगा लूंगा मैं साथ रहने से तेरे है डर ज़िन्दगी// जब से उसकी मिली है मुहब्बत मुझे जीस्त में आ गई लौट कर ज़िन्दगी// चल मकां न सही सायबां तो मिले इतना सा तो रहम मुझ पे कर ज़िन्दगी// बारिशें दर्द की ही बरसतीं रहीं और कितना पिऊं मैं ज़हर ज़िन्दगी// नाम लेकर तुम्हारा चले जाता हूं जाने कितना है लंबा सफर ज़िन्दगी// बाद तेरी मुहब्बत की जानी क़दर हो गया लम्हा अब हर शरर ज़िन्दगी// मौलिक सृजन ऋतु अग्रवाल मेरठ



