Saturday, June 13, 2026
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बारिशें दर्द की ही बरसतीं रहीं और कितना पिऊं मैं ज़हर ज़िन्दगी

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क्यों भटकती है तू दर-ब-दर ज़िन्दगी
तू भी मुझ सी हुई बेअसर ज़िन्दगी//

मौत को तो गले से लगा लूंगा मैं 
साथ रहने से तेरे है डर ज़िन्दगी//

जब से उसकी मिली है मुहब्बत मुझे 
जीस्त में आ गई लौट कर ज़िन्दगी//

चल मकां न सही सायबां तो मिले 
इतना सा तो रहम मुझ पे कर ज़िन्दगी//

बारिशें दर्द की ही बरसतीं रहीं
और कितना पिऊं मैं ज़हर ज़िन्दगी//

नाम लेकर तुम्हारा चले जाता हूं 
जाने कितना है लंबा सफर ज़िन्दगी//

बाद तेरी मुहब्बत की जानी क़दर 
हो गया लम्हा अब हर शरर ज़िन्दगी//

मौलिक सृजन 
ऋतु अग्रवाल
मेरठ
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