नैनों से बहती अश्कों की बरसात रे,
काबू में ना रहते दिल के जज्बात रे।
प्रीतम है घर मे जैसे कोई गुमशुदा,
आधी है बीती आधी रहती रात रे।
खोया-खोया रोता रहता है दिल सदा
अधरों पर रहती है उनकी ही बात रे।
चिंता में झड़ते रहते सिर से बाल हैँ,
तरुवर से गिरते रहते है जैसे पात रे।
मनसीरत है पिंघलता जैसे जलजला,
देता ना हमराही राहों मे साथ रे।
सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)



