Friday, April 17, 2026
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आसथा की चीख-पुकारःभूत उतारने व इलाज के नाम पर महिलाओं को उल्टा लिटाकर सीढ़ियों से घसीटा जाता है ओैर फिर……..

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भीलवाड़ा।  मंदिर में माता रानी के जयकारे के बीच महिलाओं की चीखें। कहीं महिला को उल्टा लिटाकर सीढ़ियों पर घसीटा जा रहा। कहीं कड़ाके की सर्दी में महिलाओं को ठंडे पानी से नहलाया जा रहा। उनके बाल खींचे जा रहे। लात-घूसों से पिटाई की जा रही है।घटना है राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के बंक्यारानी माता मंदिर का। यहां भूत उतारने और इलाज के नाम पर महिलाओं के साथ बेहिसाब जुल्म हो रहा है। यहां तक कि चोरी-छिपे उन्हें चमड़े के जूते से पानी भी पिलाया जाता है।

शनिवार का दिन। कड़ाके की सर्दी के बीच सुबह 4 बजे मैं मंदिर पहुंची। दुकानें सज गई थीं। भक्तों की भीड़ बढ़ रही थी। लोग जयकारे लगा रहे थे। बीच-बीच में महिलाओं की चीखें गूंज रही थीं। मंदिर में मार-पीट और महिलाओं की चीखें…? मुझे थोड़ा अजीब लगा।करीब 200 सीढ़ियां चढ़कर मैं मंदिर के अंदर घुसी तो देखा छोटा सा गर्भगृह है, जिसमें एक देवी की प्रतिमा है। कुछ लोग उनकी पूजा कर रहे हैं। दूसरी तरफ महिलाओं को सीढ़ियों पर उल्टा लिटाकर घसीटा जा रहा है। उन्हें लात-घूसों से पिटा जा रहा है। जबरन मंदिर की परिक्रमा कराई जा रही है। महिला चलते हुए जरा भी रुकती है तो उसकी पिटाई होने लगती है।गर्भगृह के पास करीब दो घंटे रुकती हूं। उस दौरान चार-पांच महिलाओं के साथ ओझा ऐसा ही करते हैं।

मैं मंदिर से बाहर निकलती हूं। यहां सीढ़ियों पर एक महिला उल्टा लेटी है और पीठ के बल रेंगते हुए नीचे उतर रही है। साथ में उसके घर की महिलाएं भी हैं। वे उसे ऐसा करने के लिए फोर्स कर रही हैं। बीच-बीच में महिला थककर रुक जाती है, तो ओझा उसका पैर पकड़कर नीचे खींचने लगते हैं। उसके हाथ, पैर और पीठ छिल जाती है। वह रहम की भीख मांगती है, लेकिन भोपा पर कोई फर्क नहीं पड़ता। करीब 15-20 मिनट लगते हैं ऊपर से नीचे उतरने में। मेरे पास ही एक महिला खड़ी है। वह इस महिला की सास है। मैं पूछती हूं- बहू के साथ ऐसा क्यों करवा रही हैं आप?

वे बताती हैं, ‘इसके ऊपर कोई साया है। सूखी सब्जी बनाने को कहती हूं तो पानी डाल देती है। पानी वाली सब्जी बनाने को कहती हूं तो सूखा बना देती है। हर काम उल्टा करती है। इसके शरीर में कोई घुसा है, वही इससे ये सब करवा रहा है।’

मैंने पूछा किसी डॉक्टर से नहीं दिखाया? वे बिना जवाब दिए आगे बढ़ जाती हैं। मैं दोबारा बात करने की कोशिश करती हूं, लेकिन वे मुझे अनसुना कर देती हैं। मैं आगे बढ़ती हूं। सीढ़ियों के नीचे एक महिला बैठी है। चुनरी से उसका सिर ढंका है। भोपी उसका बाल पकड़कर खींच रही है। उससे जबरन कुछ बुलवाने की कोशिश कर रही है। वह नहीं बोलती है तो उसे मुक्के से मारती है। इसी बीच महिला एक कुत्ते की तरफ इशारा करती है। तभी भोपी तपाक से बोल पड़ती हैं- अच्छा, अच्छा ये कुत्ते की बली देने के लिए बोल रही है।

भोपी उस महिला को ज्वाला मंदिर ले जाती है। ज्वाला मंदिर, बंक्यारानी मंदिर के ठीक नीचे है। यहां 5-6 घंटे महिला को भोपी इधर से उधर घुमाती है। उसके बाद महिला अपने घर वालों के साथ बाहर निकल जाती है। मैं महिला के घर वालों से बात करने की कोशिश करती हूं, लेकिन वे मना कर देते हैं। ज्वाला मंदिर में एक महिला को बांधकर फर्श पर घसीटा जा रहा है। तीन महिलाएं उसे खींच रही हैं। पूछने पर उन्हीं में से एक महिला बताती हैं, ‘इस महिला के अंदर बुरी आत्मा है। पूरा चक्कर काट लेगी तभी वो आत्मा इसके शरीर से जाएगी।’

थोड़ी दूर पर एक महिला चूल्हे पर खाना पका रही है। उसके बगल में 20-22 साल की एक महिला बैठी है। बाल बिखरे हैं। कपड़े और स्वेटर काफी मैले हैं। पूछने पर पता चला कि देविका (बदला हुआ नाम) नाम की यह महिला चितौड़ से आई है। उसकी सास इलाज के लिए मंदिर लाई थी फिर यहीं छोड़कर चली गई। अब बहन देखभाल कर रही है। मैं पूछती हूं क्या दिक्कत है आपको? देविका बताती हैं, ‘तबीयत खराब चल रही थी। ठीक से घर के काम नहीं कर पाती थी। एक दिन पड़ोसी ने सास से कहा कि तुम्हारी बहू पर बुरी आत्मा का साया है। उसे बंक्यारानी माता मंदिर ले जाओ। मैंने सास को समझाया कि डॉक्टर के पास चलिए, इलाज कराइए, लेकिन वह नहीं मानीं।

मुझे दो जोड़ी कपड़े के साथ यहां छोड़ गई। पांच शनिवार हो गए इलाज कराते हुए, कोई फायदा नहीं हुआ। भोपा-भोपी जबरदस्ती करते हैं। चोटी खींचते हैं, मारते हैं। मैं उनके सामने लाचार हो जाती हूं, कुछ नहीं कर पाती।पति खेती-किसानी करते थे। अभी कमाने के लिए गुजरात गए हैं। यहां अपनी देखभाल के लिए बहन को बुलाई हूं। दो छोटे बच्चे हैं, उनके लिए जीना चाहती हूं। जल्द घर लौटना चाहती हूं। क्या बताऊं मैडम घरवाले भी तो मेरी नहीं सुनते।’

इसके बाद मेरी मुलाकात मध्य प्रदेश के नीमच से आई सोनाली (बदला हुआ नाम) से होती है। वे अपनी ननद गीता का इलाज कराने के लिए मंदिर आई हैं।

सोनाली बताती हैं, ‘ननद के पेट में दर्द हुआ। दवाई खिलाई, लेकिन आराम नहीं मिला। मैं किसी और डॉक्टर के पास जाना चाहती थी। इनकी जांच कराना चाहती थी, लेकिन ससुर ने कहा कि गीता को दवा की जरूरत नहीं है। इसे लेकर मंदिर चले जाओ। पांच हफ्ते से यहां गीता का इलाज चल रहा है। अभी कोई फायदा नहीं है।’

कहां हैं आपकी ननद?

जवाब में सोनाली एक दुबली-पतली लड़की की ओर इशारा करती हैं। मैं उससे बात करना चाहती हूं, लेकिन वह कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं है। भोपा की मार और इलाज की प्रक्रिया ने उसे सदमे में पहुंचा दिया है। यहां लगभग हर महिला ने कुंड में स्नान कराने की बात कही। मैंने एक महिला से कुंड के बारे में पूछा तो बताया कि कुंड यहां से दो किलोमीटर दूर है। इसके बाद मैं उस कुंड को देखने के लिए निकल जाती हूं। दोपहर का वक्त। एक बड़े से कुंड में पानी भरा हुआ था। उसकी दीवारों पर लिखा था कष्ट निवारण कुंड। इसी कुंड के जल से महिलाओं को नहलाया जाता है। मैंने कुंड के अंदर हाथ डालकर देखा तो ऐसा लगा जैसे उसमें बर्फ जमी हो।

मैंने एक शख्स से पूछा आज कोई भोपा यहां नहीं आया क्या? जवाब मिला- अभी दोपहर में कहां कोई दिखेगा। शाम ढलने दीजिए। पूरी रात यहां खेल होता है। दो घंटे बाद तीन-चार महिलाएं एक महिला को पकड़कर कुंड के पास लाती हैं। उसे ठंडे पानी से नहलाती हैं। उससे कुछ कहलवाने की कोशिश करती हैं। महिला कुछ बोल नहीं पाती। भोपा-भोपी उसे पीटने लगते हैं। कभी मुक्के से मारते हैं तो कभी बाल खींचते हैं।इसके बाद वहां चार-पांच और महिलाएं आती हैं। उनके साथ भी भोपा-भोपी वैसा ही करते हैं।

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