ग्रुरूग्राम, 24 जनवरी | बिहार के दो बार मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर को जन्म शताब्दी वर्ष में भारत रत्न सम्मान देकर केंद्र सरकार ने बड़ा संदेश दिया है। स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षक के रूप में सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले जननायक का जन्म समस्तीपुर के पितौंझिया में 24 जनवरी, 1924 को हुआ था। अब यह गांव कर्पूरीग्राम के नाम से चर्चित है। समाजसेवी ईं आर के जायसवाल ने कहा कि जननायक कर्पूरी ठाकुर की जन्म शताब्दी के पहले जननायक को भारत रत्न देने की घोषणा केंद्र सरकार कि सबसे बड़ी घोषणाओं में से एक है और यह देर से ही सही यह घोषणा जननायक जी के इमानदार राजनीतिक जीवन से प्रेरित लोगों को बहुत बड़ी हौसला मिली है।
गौरतलब हो कि स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षक के रूप में सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले जननायक का जन्म समस्तीपुर के पितौंझिया में 24 जनवरी, 1924 को हुआ था। अब यह गांव कर्पूरीग्राम के नाम से चर्चित है। कर्पूरी ठाकुर का निधन 64 साल की उम्र में 17 फरवरी, 1988 को दिल का दौरा पड़ने से हुआ था। एक बार उप मुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद कर्पूरी ठाकुर रिक्शे से ही चलते थे क्योंकि उनकी जायज आय कार खरीदने और उसका खर्च वहन करने की नहीं थी। कर्पूरी ठाकुर की आर्थिक तंगी को देखते हुए हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री व देश के उपप्रधान मंत्री देवीलाल ने पटना में अपने एक हरियाणवी मित्र से “कहा था कि कर्पूरीजी कभी आपसे पांच-दस हज़ार रुपये मांगें तो आप उन्हें दे देना, वह मेरे ऊपर आपका कर्ज रहेगा।” बाद में देवीलाल ने अपने मित्र से कई बार पूछा कि भई कर्पूरी जी ने कुछ मांगा ? वे हर बार मित्र का जवाब होता – नहीं साहब, वे तो कुछ मांगते ही नहीं। यही नहीं उनसे जुड़े कुछ लोग बताते हैं कि कर्पूरी ठाकुर जब राज्य के मुख्यमंत्री थे तो उनके रिश्ते में उनके बहनोई उनके पास नौकरी के लिए गए और कहीं सिफारिश से नौकरी लगवाने के लिए कहा। उनकी बात सुनकर कर्पूरी ठाकुर गंभीर हो गए। उसके बाद अपनी जेब से पचास रुपये निकालकर उन्हें दिए और कहा, “जाइए, उस्तरा आदि ख़रीद लीजिए और अपना पुश्तैनी धंधा आरंभ कीजिए।”
समाजसेवी जायसवाल ने कहा कि जननायक जी के द्वारा देश लिए किए गए बलिदान व पिछड़े वंचित लोगों के लिए किया गया उद्धार यह समाज उनके ऋणी है। उन्हें आपातकाल के दौरान कई महीनों तक जेल में बंद रखा गया। राजनीति में इतना लंबा सफ़र बिताने के बाद जब वो मरे तो अपने परिवार को विरासत में देने के लिए एक मकान तक उनके नाम नहीं था और ना ही अपने पैतृक घर में वो एक इंच जमीन जोड़ पाए। इसमें कोई संदेह नहीं कि वे आज के राजनैतिक व जनप्रतिनिधि लोगों के लिए बहुत बड़े प्रेरणा के श्रोत में से एक है।



