नई दिल्ली। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी नोट को चलन से बाहर कर दिया गया हो। 2016 में तो 500 और 1000 के नोट पर प्रतिबंध ही लगा दिया गया था। हालांकि, नोट को चलन से बाहर करने या फिर उस पर प्रतिबंध लगाने की कहानी 5-10 साल नहीं 75 साल से भी ज्यादा पुरानी है। तब जब 10,000 के नोट भी छापे जाते थे। उस समय भी आरबीआई ने काले धन पर चोट की बात कहकर 10,000 के नोट को चलन से बाहर कर दिया था। सबसे पहले यह काम 1946 में हुआ था. यानी आजादी से एक साल पहले।
मौजूद जानकारी के अनुसार, 12 जनवरी 1946 को ब्रिटिश इंडिया के गवर्नर जनरल सर आर्चीबाल्ड ने बड़े नोटों के विमुद्रीकरण का अध्यादेश पारित किया था। इसके अगले दिन यानी 13 जनवरी 1946 को 500, 1000 और 10,000 के नोट चलन से बाहर हो गये थे। तब 100 रुपये से ऊपर के सभी नोट को बंद कर दिया गया था। तत्कालीन सरकार का तर्क था कि कई बड़े व्यापारियों ने बड़े नोटों के रूप में काला धन जमा कर लिया था और इनकम टैक्स नहीं भर रहे थे। गौरतलब है कि भारत में अब तक 10,000 रुपये से अधिक के मूल्य वर्ग का कोई नोट नहीं छापा गया है।
1978 में फिर से नोटबंदी
1946 में बड़े नोट बंद हुए लेकिन 1954 में इन्हें फिर छापा गया। इस बार 10,000 रुपये के साथ 5,000 रुपये का भी नोट छपा। हालांकि, 1978 में मोरारदी देसाई के प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए एक बार फिर नोटबंदी का ऐलान किया गया। 16 जनवरी 1978 को 1000, 5000 और 10,000 रुपये के नोट बंद कर दिये गए। इसके पीछे का कारण यह माना जाता है कि सरकार पिछली सरकारों के कुछ भ्रष्ट नेताओं को निशाने पर ले रही थी।



