ज़ाकिर हुसैन एक नाम, जिसने बचाई सेकडों जान
आजमगढ़। बदकिस्मती कहें या जागरूकता की कमी, हमारे देश में समय पर ब्लड नहीं मिलने के कारण हर साल हजारों लोग काल के गाल में चले जाते हैं.उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में पैदा हुये ज़ाकिर देश में ब्लड की किल्लत की इस गंभीर समस्या को न सिर्फ समझते हैं, बल्कि इससे निपटने के लिए जमीन पर काम भी कर रहे हैं. एक फोन कॉल पर वह लोगों तक पहुंचते हैं और निशुल्क खून का इंतजाम करते हैं। वह लोगों को इस महादान की अहमियत को समझाते हैं।
यह कहानी ज़ाकिर हुसैन की है, जो बीते साढ़े 4 वर्षों से रक्तदान को लेकर जागरूकता अभियान छेड़े हुए हैं और अपने साथियों की मदद से अब तक 543 से अधिक रोगियों तक हज़ारों यूनिट्स तक खून पहुंचा चुके हैं. मीडिया से खास बातचीत में ज़ाकिर ने अपना अब तक सफ़र शेयर किया और बताया कि वो कैसे आगे बढ़ते जा रहे हैं:
बातचीत की शुरुआत करते हुए ज़ाकिर कहते हैं, ”भाई साहब वो साल 2016 था. मेरे दोस्त सलाहुद्दीन की पत्नी पेट से थीं. प्रसव पीड़ा शुरू होने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया था. इलाज के दौरान उन्हें ‘ओ’ निगेटिव ब्लड की जरूरत थी. मेरे दोस्त और उसके घरवालों ने खूब कोशिश की, मगर वो ब्लड का इंतजाम नहीं कर सके. उन्होंने लोगों से मदद की गुहार भी लगाई, मगर कोई ब्लड देने के लिए आगे नहीं आया. अंतत: ब्लड के अभाव में भाभी की सांसें थम गईं. इस घटना ने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया.”

ज़ाकिर भावुक होते हुए आगे कहते हैं, ”सलाहुद्दीन मेरे दोस्त हैं. उसके परिवार के दर्द ने मुझे सोचने पर मजबूर किया. भाभी के निधन के बाद मैंने तय किया कि मैं न सिर्फ खुद जरूरतमंदों को बल्ड डोनेट करूंगा. बल्कि दूसरों को भी इसके लिए जागरूक करूंगा।वो दिन था और आज का दिन है, अब मेरे साथ ब्लड देने वाले युवाओं की एक बड़ी सेना सक्रिय है।अब तक हम 543 से अधिक लोगों तक खून पहुंचा चुके हैं.”
किसान परिवार में पैदा हुए 29 वर्षीय ज़ाकिर जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली के छात्र रह चुके हैं. दिल्ली में रहते हुए ही उन्होंने अल फलाह फाउंडेशन (ब्लड डोनेट ग्रुप) बनाया था और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचे. 28 सिंतबर 2019 को उन्होंने अपने ब्लड डोनेट ग्रुप की शुरुआत की थी. शुरुआत में जेया खालिद,मिर्जा ताबिश,अखिलेश मौर्या,आदिल और नदीम आदि उनकी टीम का हिस्सा थे. धीरे-धीरे लोग जुड़ते गये और अब उनके ग्रुप में करीब हज़ारों युवा साथी जुड़े हुए हैं, जोकि उत्तर प्रदेश,बिहार और देश की राजधानी दिल्ली में सक्रिय हैं.
‘साजिद साहब’ ने हर रास्ते पर प्रेरित किया
ज़ाकिर के लिए यहां तक का सफर आसान नहीं रहा. 2021 में पिता की मृत्यु के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी. अपनी बूढ़ी मां की देखभाल के लिए उन्हें दिल्ली से वापस आजमगढ़ लौटना पड़ा था. एक पल के लिए ज़ाकिर को लगा था कि वो अपनी ब्लड मुहिम को आगे नही बढ़ा पाएंगे. मगर ‘साजिद साहब’ और बहन अंजुम जैसे अपने एक बार फिर उनका सहारा बने. उन्होंने हर कदम पर ज़ाकिर का साथ दिया और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया. परिणाम स्वरूप ज़ाकिर आगे बढ़े और अब पूरे इलाके की पहचान बन चुके हैं.
अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए ज़ाकिर कुछ बड़ी घटनाओं का जिक्र करते हैं. ज़ाकिर बताते हैं कि एक बार जब वो एक महिला की मदद के लिए अस्पताल पहुंचे थे तो उन्होंने देखा कि महिला 1, 2, और 5 के सिक्के जोड़कर डॉक्टर को फीस के रूप में सौंप रही थी. इसी तरह एक स्थानीय नेता फोन पर यह कहते हुए रो पड़े थे कि ज़ाकिर अगर खून का इंतजाम नहीं हुआ तो उनके अपने की जान चली जाएगी.
निजी जिंदगी प्रभावित हुई, मगर पीछे नहीं हटे,
बातचीत के अंत में ज़ाकिर बताते हैं कि लोगों तक मदद पहुंचाने के चक्कर में अक्सर उनकी निजी जिंदगी प्रभावित होती है. कई बार उन्हें किसी की जिंदगी बचाने के लिए अपनी पत्नी और बच्चे को बीमारी की हालत में छोड़कर घर से जाना पड़ा. फिर भी वो अपनी राह में आगे बढ़ते रहे.
उन्हें खुशी है कि वो अपने पिता की राह पर चल रहे हैं. जिस तरह उनके पिता स्वर्गीय मुहम्मद हुसैन के लिए दूसरों की मदद सर्वोपरि रही उसी तरह उनके लिए भी दूसरों के लिए खून का इंतजाम करना प्राथमिकता है.वह अधिक से अधिक लोगों को अपनी इस मुहिम से जोड़ना चाहते हैं ताकि देश में ब्लड की किल्लत खत्म हो जाए और कोई ब्लड के अभाव में दम ना तोड़े।
“दोस्तों ने भी हर मुश्किल में साथ दिया,
जाकिर हुसैन कहते हैं,जीवन के हर कठिन मोड़ पर उनके बचपन के दोस्तों ने खूब साथ दिया,जाकिर हुसैन ने अपने दोस्तों अब्दुर्रहीम,खलीकुर्रहमान , फ़राज़ खान आदि के लिए अपना आभार प्रकट किया है।



