Saturday, June 20, 2026
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उर्दू के अग्रणी आलोचक, शोधकर्ता, लेखक और भाषाविद् प्रोफेसर गोपीचंद नारंग की पुण्यतिथि के मौके पर उर्दू प्रेमियों की ओर से उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए।

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पुण्य तिथि पर विशेष

सुल्तानपुर लोधी। जानकारी के अनुसार गोपीचंद नारंग का जन्म 11 फरवरी, 1931 को बलूचिस्तान में हुआ था, लेकिन वह बाद में दिल्ली में रहते थे। उन्होंने नियमित रूप से पाकिस्तान में उर्दू साहित्यिक मंचों में भाग लिया जहां उनके ज्ञान को उच्च सम्मान में रखा गया था। उन्होंने उर्दू बैठकों और वार्ताओं में भाग लेने के लिए पूरी दुनिया की यात्रा की और उन्हें उर्दू के राजदूत के रूप में भी जाना जाता है। जबकि उन्हें भारत में पद्म भूषण की उपाधि मिली, उन्हें पाकिस्तान में कई पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किया गया। वे भारत की सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक संस्था साहित्य अकादमी के अध्यक्ष थे ।
प्रोफेसर गोपीचंद नारंग का बचपन क्वेटा में बीता। उन्होंने 1954 में दिल्ली विश्वविद्यालय से उर्दू में एमए और 1958 में उसी विश्वविद्यालय से भाषा विज्ञान में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। गोपीचंद नारंग ने 1957 में सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली में व्याख्याता के रूप में पढ़ाना शुरू किया और 1995 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में पढ़ाया। वह दिल्ली विश्वविद्यालय के मानद प्रोफेसर, प्रोफेसर ई. मेरिटस थे ।
लेखकत्व और संकलनों के संबंध मे उन्होंने बताया कि प्रोफेसर गोपीचंद नारंग चौसठ पुस्तकों के लेखक हैं। इन पुस्तकों में से पैंतालीस उर्दू में, बारह अंग्रेजी में और सात हिंदी में लिखी गई हैं। उन्होंने तीन अध्ययन प्रस्तुत किए हैं: हिंदुस्तानी किस्सों से मख़ूज़ उर्दू मसनवियां (1961), उर्दू ग़ज़ल और हिंदुस्तानी ज़हान-ओ-तहज़ीब (2002) और हिंदुस्तान की तहरीक-ए-आज़ादी और उर्दू शायरी (2003)। नारंग की संबंधित पुस्तकें- अमीर खुसरो का हिंदवी कलाम (1987), सानिहा-ए-कर्बला बत्तौर शेरी इस्तियारा (1986) और उर्दू ज़बान और लिसानियात (2006) सामाजिक-सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अध्ययन हैं।
संरचनावाद, उत्तर संरचनावाद और पूर्वी काव्यशास्त्र , साहित्य का बदलता परिदृश्य
साहित्यिक आलोचना और शैली , अमीर खुसरो का हिंदी कलाम, भारतीय कहानियों से प्राप्त उर्दू मसनवी ,भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और उर्दू कविता , प्रगतिवाद, आधुनिकतावाद, उत्तर आधुनिकतावाद ,आधुनिकता के बाद ,रहस्यवाद, मानवता और प्रेम के कवि वली दक्नी ,अनीस और दबीर बीसवीं सदी में उर्दू साहित्य ,फिराक गोरखपुरी ,सज्जाद जहीर, उर्दू की नई बस्तियां , इकबाल की कला ,काल्पनिक कविता ,कागज में आग ,आधुनिक साहित्यिक सिद्धांत ,गालिब, साउंडनेस और पोएटिक्स इत्यादि हैं।इस मौके पर उर्दू प्रेमी राजेन्द्र पंडित , सेवा सिंह, रविंदर रोकी , शरणजीत सिंह तख़्तर व मुख्तियार सिंह चंदी इत्यादि मौजूद थे ।
डा सुनील धीर ,सुल्तानपुर लोधी

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