पुस्तक समीक्षा
वुडबरी इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल, आदमपुर रोड, भोगपुर, जालंधर की प्रिंसिपल सुमन बाला जी की पुस्तक ‘विधवा तन सती मन’ प्राप्त हुआ। विशुद्ध पंजाबी भाषा में लिखी गई यह पुस्तक अपने शिल्प एवं कथानक को लेकर अद्वितीय है। इसके पहले सुमन बाला जी की हिंदी कविताएँ ‘वांग्मय क्षितिज: एक साहित्यिक उपवन’ के दस कवियों के साझे संकलन ‘अभ्युदय’ में छप चुकी हैं। इसके साथ ही सुमन बाला जी अंग्रेजी भाषा में एथिक्स, मोरल, वैल्यू और मोटिवेशन पर गजब का स्पीच देती हैं। जो सुनने वालों में प्राणवायु का संचार करता है। मतलब सुमन बाला जी पंजाबी, हिंदी तथा अंग्रेजी भाषाओं में समान अधिकार रखती हैं। उनकी विद्वत्ता और वाक्पटुता अतुलनीय है। वह अपना कोई भी कार्य बहुत पेशेवर, पारंगत एवं सिद्धहस्त तरीके से करती हैं।
अपनी पुस्तक ‘विधवा तन सती मन’ में सुमन बाला जी ने राजा राम मोहन राय, लॉर्ड विलियम वेंटिक, महात्मा ज्योतिबा फुले तथा सावित्री बाई फुले इत्यादि को बड़े फख्र के साथ याद किया है। क्योंकि उपर्युक्त हस्तियों ने समाज सुधार का बहुत बड़ा मार्ग प्रशस्त किया। लेखिका ने ‘सती प्रथा की सी?’, ‘सती प्रथा दे खातमे लई आंदोलन अते अंत’, ‘की सच विच हो गिया सती प्रथा दा अंत’ तथा ‘अज्ज सती प्रथा किवें जिऊंदी है?’ जैसे शीर्षकों के अन्तर्गत सती प्रथा और विधवा जीवन का विशद् चित्र खींचा है।
लेखिका ने सती प्रथा का इतिहास बताते हुए उसे आज के सन्दर्भ से जोड़कर बहुत ही मार्मिक आख्यान प्रस्तुत किया है। लेखिका का मानना है कि 510 ईस्वी से शुरू हुई सती प्रथा घिनौनी और निन्दा योग्य तो है ही। साथ ही यह पुरुष प्रधानता तथा पितृसत्तात्मकता का नंगा नाच है। भले ही आज कुछ मायनों में सती प्रथा खत्म हो गई है। पर पूरी तरह से अभी भी खत्म नहीं हुई है। उसके दंश आज भी तारी हैं। आज भी विधवा औरतें अपने वैधव्य को वैसी ही मानसिक प्रताड़ना से झेलने को अभिशप्त हैं।
आज भी विधवा जीवन में आमूल चूल परिवर्तन न देखकर सुमन बाला जी व्यथित हैं। प्राचीन से लेकर अर्वाचीन काल तक अनेक जगहों पर उनके द्वारा सफेद कपड़े पहनना, मेकअप नहीं करना, ब्लाउज नहीं पहनना, उनसे कोई शुभ कार्य की शुरूआत नहीं कराना, उन्हें अपशकुन की दृष्टि से देखना तथा उनकी जमीन, जायदाद व सम्पत्ति इत्यादि हड़प लेना समाज के द्वारा दिया गया घोर पीड़ादायक पहलू है।
सुमन बाला जी सवाल खड़े करती हैं कि ‘सारे कट्टड़ पंथी ते अनुचित प्रथा औरतां नाल किऊं?’ और ‘इह सारीआं प्रथावां इक पासड़ किऊं हो गईआं?’ लेखिका दुनिया की विधवाओं से भारतीय विधवाओं की तुलना करती हैं तो यहाँ की विधवाओं की भयावह स्थिति पाती हैं। वो इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि युग चाहे कोई भी हो, औरतों के साथ नाइंसाफी हर युग में हुई है और यही नाइंसाफी ही इस पुस्तक का निचोड़ है। इस नाइंसाफी को दूर करने के लिए वह सुझाव भी प्रेषित करती हैं कि किस प्रकार विधवा औरतों के जीवन में यथोचित सुधार किया जा सकता है?
इसलिए इस पुस्तक को पढ़ा जाना चाहिए। इसका गहन अध्ययन करना चाहिए। समाज सुधार की दृष्टि से यह पुस्तक एक मानीख़ेज़ रचना है। इसे तो विश्वविद्यालयों के सिलैबस में शामिल करना चाहिए। इसके साथ ही मेरा यह भी मानना है कि इस मूल्यवान पुस्तक का हिंदी व अंग्रेजी के साथ अन्य भाषाओं में अनुवाद भी होना चाहिए। जिससे भाषायी अवरोध को पार कर एक बहुत बड़ा तबका इस महान् कृति से परिचित और लाभान्वित हो सके। साहित्य में मील का पत्थर स्थापित करने के लिए लेखिका को साधूवाद। ढेर सारी शुभकामनाएँ।



