Sunday, April 12, 2026
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बदली बरसी गगन से,धरा की मिटी प्यास। पपीहे सा तन प्यासा , मनवा बहुत उदास।।

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,*** प्रेम के दोहे *****
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मेघ गरजते गगन में , बूँद गिरे रस धार।
प्यासा मन है बावरा, आ जाओ घर द्वार।

बादल छाये गगन में,बिजली चमके जोर।
अंग प्रत्यंग जल उठे,पिया मिलन की लोर।।

बदली बरसी गगन से,धरा की मिटी प्यास।
पपीहे सा तन प्यासा , मनवा बहुत उदास।।

शीत आर्द्र हवा चली , जाग उठा अनुराग।
तनबदन है सिहर उठा , कौन बुझाए आग।।

मनसीरत पथ देखता , दोनों बाँह पसार।
आ जाओ आलिंगन में , मन में प्रेम अपार।।

-सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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