Monday, April 13, 2026
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निधन के बाद निकाला जाता था पोप का दिल, लेकिन इस बार ऐसे होगा पोप का अंतिम संस्कार …..

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नई दिल्ली/वेटिकन सिटी, 22 अप्रैल। दुनियाभर के ईसाइयों के सबसे बड़े आध्यात्मिक नेता पोप फ्रांसिस के निधन के बाद वेटिकन सिटी में उनके अंतिम संस्कार की तैयारियाँ जोरों पर हैं। लेकिन इस बार कुछ परंपराएं वैसी नहीं होंगी जैसी सदियों से चली आ रही हैं। इसकी वजह खुद पोप फ्रांसिस हैं, जिन्होंने जीवन में ही अपने अंतिम संस्कार से जुड़ी परंपराओं को सरल और मानवीय बनाने का निर्णय लिया था।

नौ दिन का शोक और एक साधारण विदाई

रोमन कैथोलिक परंपरा के अनुसार, पोप की मृत्यु के बाद ‘नोवेन्डिएल’ नामक नौ दिनों का शोक काल मनाया जाता है। इस दौरान विशेष प्रार्थनाएं की जाती हैं और श्रद्धांजलि दी जाती है। लेकिन इस बार शोक की इन रस्मों के बीच सबसे खास बात है पोप फ्रांसिस की वो इच्छा, जिसमें उन्होंने राजसी विदाई के बजाय एक सामान्य पादरी की तरह अंतिम संस्कार की मांग की थी।

वेटिकन ग्रोटोज़ नहीं, बल्कि मैरी चर्च उनकी मंज़िल

अमूमन पोप का अंतिम विश्राम स्थल सेंट पीटर्स बेसिलिका के नीचे स्थित वेटिकन ग्रोटोज़ होता है, जहां अब तक कई पूर्व पोप दफन हैं। लेकिन पोप फ्रांसिस ने खुद साल 2024 में यह स्पष्ट किया था कि वे “सांता मारिया मैगीगोर बेसिलिका” में दफन होना चाहते हैं-वो चर्च जिसे वह बेहद प्रिय मानते थे और अक्सर वहाँ प्रार्थना के लिए जाया करते थे।

तीन परतों वाला ताबूत नहीं, बस एक साधारण लकड़ी का कॉफिन

परंपरा के अनुसार पोप के शव को तीन परत वाले ताबूत में रखा जाता है-सीसा, लकड़ी और देवदार की परतों में। लेकिन पोप फ्रांसिस ने इसे अस्वीकार करते हुए एक साधारण लकड़ी के ताबूत में दफनाने की इच्छा जताई थी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनके शरीर से कोई भी अंग नहीं निकाला जाए, जो कि पहले एक आम परंपरा हुआ करती थी।

खत्म की गईं सदियों पुरानी रीतियां

16वीं से 19वीं सदी के बीच पोप के शरीर को संरक्षित करने के लिए उनके दिल, लीवर और पेनक्रियाज जैसे अंग निकालकर चर्च में रखे जाते थे। आज भी 22 पोप के ऐसे अंग संगमरमर के कलशों में ट्रेवी फाउंटेन के पास एक चर्च में मौजूद हैं। लेकिन 2024 में पोप फ्रांसिस ने इस प्रथा को भी खत्म कर दिया था, इसे अनावश्यक और गैर-जरूरी बताया था।

सादगी और आध्यात्मिकता की विरासत

पोप फ्रांसिस का यह फैसला उनकी जीवनभर की सोच का प्रतिबिंब है-जहां उन्होंने चर्च की भव्यता की बजाय मानवीयता, सादगी और करुणा को प्राथमिकता दी। उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया अब एक परंपरा नहीं, बल्कि एक प्रेरणा बनने जा रही है, जो दुनिया को यह सिखाएगी कि महानता का मतलब दिखावा नहीं, बल्कि विनम्रता है।

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