Saturday, April 18, 2026
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6 साल की बच्ची ने नहीं मानी हार, छह महीने तक लगाए कोर्ट के चक्कर, दुष्कर्म के दोषी को हुई फांसी की सज़ा…

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गाज़ियाबाद। 6 साल की बच्ची ने ममेरी बहन को न्याय दिलाने के लिए छह महीने तक कोर्ट के चक्कर लगाए। मजिस्ट्रेट के सामने बेझिझक होकर बयान दिए। बिना डरे अपने बयानों पर वह टिकी रही। बच्ची के मन में ममेरी बहन को न्याय दिलाने की इच्छा थी। शुरुआत में तो पुलिस को भी लगा था कि छह साल की बच्ची कैसे बयान देगी। बच्ची के घबराने की भी चिंता थी, लेकिन बच्ची के जज्बे को देखकर सब हैरान हो गए । अधिकांश केस बच्ची के बयानों पर ही टिका रहा। बच्ची द्वारा सीआरपीसी 161 व 164 के तहत दिए बयान आरोपित को सजा दिलाने में मददगार साबित हुए।

मोदीनगर के तत्कालीन एसएचओ योगेंद्र सिंह बताते हैं कि मृतका की ममेरी बहन छह वर्षीय बच्ची ही घटनाक्रम की प्रत्यक्षदर्शी थी। आरोपित उसे भी दुष्कर्म के इरादे से लेकर गया था, लेकिन बच्ची वहां से भाग आई थी। वह रोते हुए आरोपित की दरिंदगी के बारे में बताती थी। बच्ची मूलरूप से लोनी थानाक्षेत्र की रहने वाली है। यहां मोदीनगर के एक गांव में अपने नाना के यहां रहती है।

आरोपित खेत में बयान देने वाली बच्ची की 9 साल की बहन की ईज्ज़त लूट रहा था। वह पीड़ा से चीख रही थी, लेकिन उसकी आवाज खेतों में ही दबी रही। पीड़ा में मासूम ने बचने के लिए आरोपित के बालों को खींचा। बाल टूटकर मासूम की मुट्ठी में फंस गए। आरोपित के हाथ पर नाखून भी मारे, लेकिन उसे पीड़िता पर दया नहीं आई। पुलिस ने इन बालों और नाखून के नमूनों को फोरेंसिक जांच के लिए लैब भेजा था।

अगस्त 2022 में जन्माष्टमी के दिन ममेरी बहन के साथ घर के पास अपने दोस्तों के साथ खेल रही थी। जब आरोपित उन्हें अपने साथ लेकर गया तो दोस्तों ने उसे देखा। पुलिस ने इन दोस्तों को भी गवाह बनाया था। कुछ महीने पहले गांव में चर्चा थी कि गवाहों को अपने बयान से मुकरने का दबाव बनाया जा रहा है। मामले में कुछ लोग फैसला कराना चाहते हैं। लेकिन, बयान से मुकरने से सभी ने मना कर दिया। मासूम के कपड़ों पर भी खून की छीटें मिले। ये सभी फोरेंसिक साक्ष्य के रूप में पुलिस ने कोर्ट में पेश किए।

उधर, जिस समय आरोपित बच्चियों को साइकिल पर ले जा रहा था वह सीसीटीवी फुटेज में कैद हो गया था। आरोपित को सज़ा दिलाने के लिए पुलिस के पास पहले दिन से ही पर्याप्त सबूत थे। महज़ सात दिन में चार्जशीट दाखिल की गई थी, लेकिन इस तरह की घटना की पुनरावृति ना हो, इसलिए आरोपित को फांसी होनी जरूरी थी। आरोपित को फांसी की सज़ा दिलाने के लिए दिन-रात मेहनत कर सबूतों को जुटाया गया। कोर्ट पैरोकार से भी लगातार संपर्क किया गया। बच्ची के पिता, दोस्त व गांव के लोग मामले में गवाह बनाए गए। शुरू से भी प्रभावी पैरवी की गई थी।

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