ले रहे हैं मजा रुलाने में
दर्द की पीर को बढ़ाने में//
प्यार दो पल नहीं है अफ़साना
जीस्त कट जाती है निभाने में//
फ़र्ज़ मां-बाप सा निभाओ तो
लगता क्या है जुबां लड़ाने में//
जान ही जा रही हमारी तो
आपसे प्यार को निभाने में//
रूठना है शुमार आदत में
उनसे दूरी भली ज़माने में//
थक गए हैं सनम अज़ी हम तो
बारहा आपको मनाने में//
चलके अपने कदम निशां छोड़ो
कौन दे साथ इस ज़माने में//
हमको मासूमियत भली लगती
है मज़ा सबको ही हंसाने में//
दिल गया जान भी गई मेरी
इश्क़ की कीमतें चुकाने में//
मौलिक सृजन
ऋतु अग्रवाल
मेरठ



