Sunday, April 12, 2026
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ले रहे हैं मजा रुलाने में दर्द की पीर को बढ़ाने में

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ले रहे हैं मजा रुलाने में
दर्द की पीर को बढ़ाने में//

प्यार दो पल नहीं है अफ़साना
जीस्त कट जाती है निभाने में//

फ़र्ज़ मां-बाप सा निभाओ तो
लगता क्या है जुबां लड़ाने में//

जान ही जा रही हमारी तो
आपसे प्यार को निभाने में//

रूठना है शुमार आदत में
उनसे दूरी भली ज़माने में//

थक गए हैं सनम अज़ी हम तो
बारहा आपको मनाने में//

चलके अपने कदम निशां छोड़ो
कौन दे साथ इस ज़माने में//

हमको मासूमियत भली लगती
है मज़ा सबको ही हंसाने में//

दिल गया जान भी गई मेरी
इश्क़ की कीमतें चुकाने में//

मौलिक सृजन
ऋतु अग्रवाल
मेरठ

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