नई दिल्ली। रमज़ान-उल-मुबारक इस्लामी कैलेंडर का 9वां महीना है। जिसकी अनगिनत विशेषताएं हैं। रोज़े का उद्देश्य “तक़वा“ भी है। तक़वा का मतलब संयम है। अर्थात जब किसी व्यक्ति का तन-मन एक समान हो जाए और वह जो कुछ भी दिन के उजाले में करे, वही रात के अंधेरे में भी करे, यह समझते हुए कि उसका खुदा उसे हर हाल में देख रहा है। रोज़े में तेज़ गर्मी के कारण जब प्यास से गला और जीभ सूख रही हो और फ्रिज में ठंडा पानी मौजूद हो और अकेलापन हो, कोई देखने वाला भी न हो, इसके बावजूद बंदा इसलिए पानी नहीं पीए।
क्योंकि उसके दिल में अल्लाह की मौजूदगी और जवाबदेही का डर है। जब यह भाव पैदा हो जाए तो इसी का नाम तक़वा है। हज़रत मौलाना अशरफ अली थानवी ने बताया कि अल्लाह का स्मरण कर पापों से बचना, यानी यह सोच कर कि मैं अल्लाह का बंदा हूं और अल्लाह मुझे देख रहा है, इसी का नाम तक़वा है। जो व्यक्ति इस बात से डरता है कि अल्लाह के दरबार में हाज़िर और खड़ा होना है। इससे वह खुद को लालसा और इच्छाओं से रोकता है। (सूरह अल-नाजिय़ात)।
इसी प्रकार रोज़े का एक उद्देश्य दूसरों की भूख की भावना को समझना भी है। इसीलिए इस महीने में दया और करुणा का भी उल्लेख है। एक हदीस का सारांश है कि पैगंबर मोहम्मद रमज़ान में अत्याधिक दान किया करते थे। इस तरह रोज़ा धनी और निर्धन के बीच अंतर समाप्त करता है और दुनिया के सभी इंसानों को जोड़ता है। रोज़े में दुर्व्यवहार, गाली-गलौज और बुरे कर्मों को रोकने की क्षमता है।
इस्लाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह हमेशा इंसान को इंसान बनने के लिए प्रोत्साहित करता है। किसी को यातना देना तो दूर, अनावश्यक रूप से पानी बहाना भी इस्लाम में मना है। वास्तव में रोज़ा सभी बुराइयों और दूसरों को सताने से रुकने का ही नाम है। रोज़ा अमन-शांति स्थापित करने का भी एक साधन है।
ईद आ रही है। सभी मुसलमानों से अपील है कि ईद पर भाईचारा बनाए रखें और अपनी खुशियों में देशवासियों को भी शामिल करें। ईद-मिलन समारोह का आयोजन करें और स्थानीय प्रभावशाली लोगों को इसमें आमंत्रित करें। यह देश के संबंधों को और मजबूत करेगा। कारी हम्माद आबिद इशाअती नाइब मोहतमिम मदरसा इशा अतुल इस्लाम व मीडिया प्रभारी जमियत उलेमा ए हल्का कस्बा लावड़ मेरठ।



