पापा की छाँव (एकता सिंह (दिल्ली )
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उनके पैरों को अपने हाथों से दबाना चाहती हूँ। अपने हाथों से उस पीड़ा को हराना चाहती हूँ। उनकी बड़ी आँखों से आज भी डर जाती हूँ। याद कर बचपन की शैतानियां,मै ठहर जाती हूँ। इस उम्र को दिन-रात चकमा दिया करते हैं। सामर्थ्य पे रोज नयी मोहर लगा दिया करते हैं। अपने हर दर्द को नजरअंदाज किया करते हैं। उनके बुलंद हौसले देख दर्द भी आह भरते हैं पापा के चेहरे पर सूरज जैसा तेज दिखता है। मानो विश्वास हर दिन इक नई ऊँचाई लिखता है अपनी ईमानदारी की रोटी पर मान करते हैं। बेदाग जिंदगी की कमाई पर अभिमान करते हैं। पापा ने मेहनत करना और बाँटना ही सिखाया है।उन्हीं के उसूलों को मैंने भी हर दफा अपनाया है। मेरे पापा से ही घर की छत हमेशा मुस्कराती है। उनकी दुआओं की बारिश मुझे भिगो जाती है।



