Thursday, June 11, 2026
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मनसीरत का राग निराला, घना अंधेर गायब उजाला, मन मे घोर उदासी छाई। भला ये कैसी नौबत आई।

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भला ये कैसी नौबत आई
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भला ये कैसी नौबत आई,
इधर कुंआ तो उधर खाई।

घर भी छूटा घाट भी छूटा,
भार्या प्यारी साथ भी छूटा,
जब से पड़ोसन मन भाई।
भला ये कैसी नौबत आई।

सुन्दर काया रास ना आई,
माया ठगनी पास ना आई,
खुद की तंग करे परछाई।
भला ये कैसी नौबत आई।

चंचल मन मचलता जाए,
इश्क का रंग उड़ता जाए,
कोइ काम ना आए दवाई।
भला ये कैसी नौबत आई।

लौटकर बुद्धू घर को चले,
आखिर अंगूर खट्टे ही लगे,
हो गई खूब जगत हँसाई।
भला ये कैसी नौबत आई।

मनसीरत का राग निराला,
घना अंधेर गायब उजाला,
मन मे घोर उदासी छाई।
भला ये कैसी नौबत आई।

भला ये कैसी नौबत आई,
इधर कुंआ तो उधर खाई।
********
सुखविंद्र सिंह मनसीरत 
खेड़ी राओ वाली (कैंथल)
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