भोपाल (ईं आर के जायसवाल)। दो दिवसीय राष्ट्रीय अखिल भारतीय नेशनल युवा चिकित्सक सम्मेलन विगत शनिवार व रविवार को भोपाल में आयोजित किया गया था। इस दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में चार सौ से भी अधिक युवा मनोचिकित्सक के साथ साथ भारत के कोने कोने से विख्यात व वरिष्ठ मनोचिकित्सक ने भी हिस्सा लिया था।
वहीं बिहार राज्य अंतर्गत मिथिला प्रांत स्थित जिला मधुबनी, ग्राम बड़हरा के विख्यात शिक्षक स्व प्रबोध मिश्र की पौत्री मनोचिकित्सक डा.अंकिता प्रियदर्शिनी ने इस सम्मेलन में “डिजिटल एरा का मेंटल हेल्थ पर प्रभाव” के विषय से सम्मेलन की शुरुआत की तथा प्रशस्ति चिन्ह एवम प्रशस्ति पत्र हासिल कर अपने जन्म स्थान बड़हरा ग्राम के साथ साथ अपने कर्म स्थान देवभूमि देहरादून को गौरवान्वित किया है।
डा.अंकिता प्रियदर्शिनी का टॉपिक आज के युग में मोबाइल, इंटरनेट, यू ट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्वीटर आदि सोशल मीडिया का व्यक्ति विशेष की मानसिक स्थिति पर कैसे प्रभाव डालता है। उसका किस उम्र के लोगों को कितना और कैसे इस्तेमाल करना चाहिए। बच्चों के इस्तेमाल करने पर अभिभावक का क्या कर्तव्य होना चाहिए। कर्तव्यों का कैसे निर्वाहन करना चाहिए, साथ ही उसका सही और गलत प्रभाव पे प्रकाश डालते हुए पूरे विश्व को जागरूक करने का प्रयास पर प्रकाश डाला।
डा.अंकिता ने समाजसेवी ईं आर के जायसवाल से बातचीत में इससे जुड़ी सभी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डिजिटल युग में नोमोफोबिया जैसी बीमारी का प्रसार 77% छात्रों में है, जिनमें से 50% से अधिक अपने मोबाइल फोन कभी बंद नहीं करते हैं।
इससे मानसिक स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव के कारण चिंता जैसे पैनिक अटैक के समान हैं और इसके प्रमुख पहचान के लक्षण भी है जैसे श्वसन संबंधी परिवर्तन, वजह पसीना, घबराहट, बन भटकाव, चिड़चिड़ापन, थकान, नींद में खलल और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई जैसे बिमारियों का सामना करना पड़ सकता है।
वहीं डा.अंकिता ने देश में बढ़ रहे इस तरह कि विमारी से बचने हेतु अपने सरकारी चिकित्सक सेवाएं व संस्थान से जिज्ञासा जताई है कि जन जागरूकता अभियान और डिजिटल स्वास्थ्य साक्षरता कार्यक्रम शुरू किये जाने चाहिए। जिम्मेदार प्रौद्योगिकी उपयोग और डिजिटल जागरूकता को प्रोत्साहित करना चाहिए। स्वस्थ कार्य-जीवन-तकनीक संतुलन को बढ़ावा देना होगा।
उपयोगकर्ता की भलाई के लिए मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों और तकनीकी उद्योग के बीच सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है, साथ ही सिमाएँ निर्धारित कर और आवश्यकता पड़ने पर पेशेवर की मदद लेने का महत्व को जागरूकता पर बल देना चाहिए ताकि हम और हमारा समाज इस गंभीर समस्या से निजात मिल सके।



