इस्लामिक नये साल मुहर्रम -उल- हराम पर वाक़या -ए- करबला (हज़रत इमाम -ए- हुसैन रज़ि. की शहादत से) हमेशा हक़ और सच के साथ खड़े रह कर ज़िंदगी गुज़ारने की मिलती है प्रेरना
संगरुर। चाँद के महीनों के हिसाब से क़ुदरत ने साल को कुछ इस तरह से ढाला है कि एक के बाद एक कड़ी जुड़ती चली जाती है। रजब के महीने से ही ख़ुदा की रहमतें बरसने लगती हैं कि शाबान का महीना आ जाता है जिस में शब -ए- बराअत होती है जिसकी अपनी एक फ़ज़ीलत है। अब देखते ही देखते रमज़ान -उल- मुबारक का महीना आ जाता है जिस में अल्लाह की तरफ़ से सब के लिए मग़फ़िरत का एलान कर दिया जाता है। लोग ईद की ख़ुशियाँ मना ही रहे होते हैं कि हज यात्रा की तैयारी शुरू हो जाती है।
इस अहम फ़रीज़े की अदायगी से लौटते ही मुहर्रम -उल- हराम का महीना आरम्भ होता है जो कि इस्लामिक नए साल के रूप में जाना जाता है। कुछ लोग इस को ख़ालिस ग़म का महीना कहते हैं जो कि सही नहीं। बेशक इस माह की पहली तिथि को हज़रत उमर फ़ारूक(रज़ि.) की शहादत हुई, और 10 को हज़रत -ए- हुसैन(रज़ि.) की। लेकिन यह तो हमारे लिए फ़ख़्र की बात होनी चाहिए।
इस में आशूरा (10 मुहर्रम वाला दिन) बड़ी फ़ज़ीलत वाला है कि इस में हर इंसान को अपने परिवार वालों पर अच्छे से अच्छा और ज़्यादा से ख़र्च करना चाहिए ताकि पूरे साल इस की बरकतें मिलती रहें। इस माह में काले कपड़े डाले रहना, नौहा और मातम करना, ताज़िये बनाना, अपने जिस्म को ज़ख़्मी करना आदि चीज़ें शरीअत से साबित नहीं। लिहाज़ा मुसलमानों को इन ख़ुराफ़ात से बचना चाहिए।
और सहाबा -ए- किराम की ज़िंदगी से सबक़ ले कर और ख़ास तौर से वाक़या -ए- करबला (हज़रत इमाम -ए- हुसैन रज़ि. की शहादत से) हमेशा हक़ और सच के साथ खड़े रह कर ज़िंदगी गुज़ारनी चाहिए। आख़िर में तमाम अहले वतन को मेरी तरफ़ से इस्लामिक नए साल सन् 1445 हिजरी के आरंभ पर ढेर सारी शुभकामनाएँ। परवरदिगार इस आने वाले साल को हम सब के लिए अमन व शांति वाला बनाए। सब को सेहत व तंदुरुस्ती के साथ लंबी उम्र अता फ़रमाए। आमीन



